मेरा आदिवासी होना
ना साड़ी, ना खोपा,
ना गोदना, ना गहना
कुछ भी नहीं पहनती
फिर कैसी आदिवासी हो तुम?
अक्सर लोग पूछते हैं मुझसे
पर मैं उनसे कहना चाहती हुं
धरती के करीब रहना ही
आदिवासी होना है
प्रकृति के साथ चलना ही
आदिवासी होना है
नदी की तरह बहना
और सहज रहना ही
आदिवासी होना है
भीतर और बाहर
हर बंधन के खिलाफ लड़ना ही
आदिवासी होना है
और अपने सुंदर होने के
सारे चिन्हों के साथ
ज्यादा मनुष्य होना ही
आदिवासी होना है
पर किसी के मन में सिर्फ
रह गया हो कोई गहना गोदना
और कोई नहीं समझ पाता है
क्या होता है आदिवासी होना
तो मैं चाहती हुं बदले समय में नए सिरे से
प्रतीकों में फंस गए हर भ्रम को तोड़ देना
इसी आदिवासीयत के साथ बचा रह सकता है
धरती पर किसी का आदिवासी होना।
रचनाकार : जसिंता केरकेट्टा
उनकी लिखि किताब “ईश्वर और बाजार” कविता संग्रह की एक कविता
आदिवासियों की खुबसूरत दुनिया में आप सभी का स्वागत है
प्रकृति मूलक संस्कृति
श्रृष्टि में प्राणियों का साक्षात्कार सर्वप्रथम प्रकृति से हुआ। तब प्राणियों को सर्वप्रथम आवश्यकता आहार की हुई एवं उसे पहचाना, प्रकृति के समस्त प्राणी आहार के लिए पेड़-पौधे, फूल-फल, पत्ते तथा दूसरे प्राणियों पर निर्भर हो गए। एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी का भक्षण किया जाना उसकी शारीरिक शक्ति, क्षमता, आकार पर निर्भर करने लगा।
उसी प्रकार मनुष्य ने भी प्राणियों के व्यवहार को समाहित कर लिया। पृथ्वी के सभी प्राणियों में केवल मनुष्य ही अपने बौद्धिक विकास की अलौकिकता के कारण प्रकृति के व्यवहार को जानने हेतु सोचने, समझने और वाणी में उद्धृत करने का तंत्र विकसित कर लिया एवं इस बौद्धिक विकास के क्रम में उसने अपने एवं समूह की सुरक्षा के लिए सुरक्षा साधनों का विकास किया।
मनुष्य के इसी बौद्धिक विकासक्रम ने कालान्तर में उसे पशुता से मनुष्यता में स्थापित कर दिया। अब मनुष्यों के समूह की जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति समूह के सदस्यों द्वारा की जाने लगी। समूह के आधार पर संसाधनों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधन उसके जीवन के अभिन्न अंग बन गए जिनके बगैर मनुष्य आज भी अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता है। अच्छाई और बुराई की समझ उसकी संतति की उत्पत्ति और सुरक्षा से प्रारम्भ हुई। संतति की सुरक्षा का एहसास एवं समझ जन्मजात ही कुछ प्राणियों में ज्यादा एवं कुछ प्राणियों में कम होता है ।
प्राणी प्रकृति प्रदत्त अपनी शारीरिक बनावट, क्षमता, आकार, रंग एवं बौद्धिक कुशलता से प्रकृति में घटित होने वाली घटनाओं से स्वयं एवं अपने समूह की रक्षा करता है ।
अपने जीवनकाल में आदिवासी समय-समय पर प्रकृति एवं प्राणियों के साथ समन्वय को स्थापित करते हुए परिवर्तित जीवन स्वरूपों को अमूल्य धरोहर की तरह अपने आने वाले संतति को विरासत में देता है। आदिवासियों ने प्रकृति के साथ सतत् पोषणीय समन्वय अपनी “संस्कृति” में समाहित किया है ।
आदिकाल से आदिवासियों के ग्रामीण जीवन में झांक कर देखें तो यह तथ्य साबित हो जाता है कि वास्तव में उसका जीवन प्रकृति से कितना जुड़ा है ।
अर्थात प्रकृति के बिना मानव तो क्या समस्त चर-अचरों का जीवन भी कुछ नहीं है! आदिम समाज प्राकृतिक आध्यात्म के दर्शन को अपने पुरखों और प्राकृतिक देवी-देवताओं के रूप में अपनाता है और अपने जीवन की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए प्रकृति की पूजा करता है । इसीलिए आदिम समाज के पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक मूल में प्रकृति पूजा का विधान मिलता है, जिसके कारण वह प्रकृति पूजक कहलाता है।
